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राजस्थान के प्रमुख राजवंश 1 चौहान राठौड़ एवं अन्य

राजस्थान के प्रमुख राजवंश

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निम्नलिखित राजस्थान के प्रमुख राजवंश थे

  • परमार राजवंश
  • जाट वंश
  • यादव वंश
  • भीनमाल के चावड़ा
  • टोंक का मुस्लिम राज्य
  • नागौर
  • झुंझुनू

परमार राजवंश ( Parmar Vansh )

‘परमार’ शब्द का अर्थ ‘ शत्रु को मारने वाला’ होता हैं। चन्द्रबरदाई के पृथ्वीराज रासो मे परमारो की उत्पित अग्निकुण्ड से बताई गई हैं।उदयपुर प्रशस्ति, पिंगल सूत्रवृति, तेजपाल अभिलेख मे परमारो को ‘ब्राह्म क्षत्रकुलीन’ बताया गया हैं।

परमारों मे आबू के परमार, मारवाड़ के परमार, सिंध के परमार,गुजरात के परमार, बागड़ के परमार, मालवा के परमार आदि शाखाएं हुई, जिनमें से आबू के परमार एवं मालवा के परमार प्रमुख हुए।

आबू के परमार ( Abu Parmar )

आबू के परमारों का मूल पुरुष धूमराज के नाम से विख्यात हैं इनकी वंशावली उत्पलराज से आरंभ होती है। आबू के परमारों की राजधानी – चन्द्रावती थी।

सिंधराज – परमार एक प्रतापी शासक हुआ। जो ‘ मरुमण्डल का महाराजा’ कहलाता था। 1002 ई. के दान पात रस से पता चलता है कि आबू पर धरणीवराह ने पुन: अधिकार कर लिया।

जालोर के परमार ( Jalore’s Parmar )

जलोर के परमार आबू के परमारों के ही वंशज थे जालौर से मिले 1087 ई. के शिलालेख में वाकपतिराज चंदन देवराज अपराजित विज्जल धारावर्ष और विसल के नाम मिलते है ।

वागड़ के परमार ( Vagad Paramar )

वागड़ के परमार मालवा के परमार कृष्णराज के दूसरे पुत्र डम्बरसिंह के वंशज थे इनके अधिकार मे dhungarpur- बांसवाड़ा
का राज्य था जिसे वागड़ कहते थे  arthunha इनकी राजधानी थी

धनिक ,कंकदेव, सत्यराज , चामुंडराज, विजयराज आदि इस वंश के शासक हुये, चामुंड राज ने 1079 में arthuna में मंडलेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया 1179 ई में गुहिल शासक सामंतसिंह ने परमारो से वागड़ छीन कर वहाँ गुहिल वंस का शासन stapit कर दिया

करौली का यादव वंश ( Yadav dynasty of Karauli )

राजस्थान में जैसलमेर के बाद यदुवंशी क्षत्रियों का दूसरा राज्य करौली था। करौली रियासत का कुछ भाग मत्स्य जनपद में तथा कुछ भाग सुरसेन जनपद में आता था। करौली के यादव वंशी राजा स्वयं को कृष्ण भगवान के वंशज मानते थे।

करौली के यादव अपने नाम के आगे सिंह न लिखकर पाल लिखते थे, क्योंकि सिंह गाय को खा जाता है और पाल का सामान्य अर्थ गाय को पालने वाला होता है।

Vijaypal ( विजयपाल )- 

करौली के यादव शाखा का मूल पुरुष/ आदि पुरुष/ संस्थापक विजयपाल था, जिसने 1040 ईस्वी में अपने राज्य की राजधानी मथुरा से हटाकर बयाना( विजय मंदिर गढ़) को बनाया।

Timan Pal ( तिमनपाल ) –

तिमनपाल ने ‘तिमनगढ़ दुर्ग’ बनवाकर उसे अपनी नई राजधानी बनाई । 1196 ईस्वी में मोहम्मद गोरी ने तिमनगढ़ दुर्ग पर आक्रमण कर यहां के शासक कुंवरपाल को हराकर तिमनगढ़ दुर्ग को जीत लिया अतः यहां से कुछ यादव परेशान होकर तिजारा व अलवर चले गए जो वहां “खाने- खाना” के नाम से पुकारे जाने लगे।

तिमनगढ़ का किला

यह दुर्ग यादव वंश के शासक तिमनपाल ने उस समय बनवाया था जब उसके मुख्य सा साम्राज्य बयाना पर दिल्ली के शासकों का अधिकार हो गया था। तिमनगढ़ का दुर्ग बयाना से कुछ ही दूरी पर है, लेकिन करौली जिले के क्षेत्र में पड़ता है।

इसे तेहनगढ़/तोहनगढ भी कहते हैं । तिमनगढ़ दुर्ग वर्तमान में घने जंगलों के बीच निर्जन अवस्था में खड़ा है। इसी दुर्ग में मूर्ति और जानवरों के अंग तस्कर ‘वामन नारायण घीया’ के द्वारा अपना मुख्य केंद्र बनाने के कारण चर्चा में रहा।

Arjun Pal ( अर्जुन पाल )- 

1327 ईस्वी में अर्जुनपाल ने तिमनगढ़ दुर्ग को मुस्लिमों से छीनकर यहां पर पुनः यादव का शासन स्थापित किया। अर्जुनपाल ने 1348 ई.में लीसिल नदी के तट पर कल्याणपुर कस्बा बसाया।

कल्याणपुर कस्बा वर्तमान में करौली के नाम से जाना जाता है। अर्जुनपाल ने ही यहां हनुमान जी की माता ‘अंजनी माता का मंदिर’ बनवाया।

Haravakshpal ( हरवक्षपाल ) – 

हरवक्षपाल ने 15 नवंबर, 1817 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि कर अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली। करौली राजस्थान की पहली रियासत थी जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सहायक संधि की।

नोट:- 19 जुलाई 1997 ईस्वी को करौली राजस्थान का 32 वाँ जिला बना।

 

जाट वंश ( Jat Dynasty )

भरतपुर का जाट वंश ( Bharatpur Jat Dynasty )

राजस्थान के पूर्वी भाग-भरतपुर,धौलपुर ,डीग आदि क्षेत्रों पर जाट वंश का शासन था ।औरंगजेब की मृत्यु के आसपास जाट सरदार चूड़ामन ने थून में किला बनाकर अपना राज्य स्थापित कर लिया था। चूड़ामन के बाद बदनसिंह को जयपुर नरेश सवाई जयसिंह ने डीग की जागीर दी एंव ब्रिजराव की उपाधि प्रदान की ।।

बदनसिंह ने 1725 ई. में डीग के महलों का निर्माण करवाया । महाराज सूरजमल ने सोथर के निकट दुर्ग का निर्माण करवाया जो बाद में भरतपुर दुर्ग के नाम से प्रसिद्ध हुआ । बदनसिंह ने उसे अपनी राजधानी बनाया । इसने जीते जी अपने पुत्र सूरजमल को शासन की बागडोर सौंप दी । सूरजमल ने 12 जून ,1761 ई. को आगरे के किले पर अधिकार कर लिया । उसके बाद उनके पुत्र जवारसिंह भरतपुर के राजा बने 

चूड़ामन जाट 1695-1721 ई)

1688ई.मे राजाराम की मृत्यु के बाद उसके भतीजे चूड़ामन जाट ने नेतृत्व की बागडोर सम्भाली औरंगजेब की मृत्यु तक विद्रोह करता रहा।उसनें भरतपुर मे जाट राज्य की स्थापना की धीरे -धीरे जाट शक्ति संगठित होती गई और औरंगजेब की मृत्यु के आसपास जाट सरदार चूड़ामन ने थून मे किला बनाकर अपना राज्य स्थापित कर लिया था।

मुहम्मदशाह के आदेश पर सवाई जयसिंह ने चूड़ामन को परास्त कर थून का किला छीन लिया। 1721 ई.मे चूड़ामन ने विष खाकर आत्महत्या कर ली।

Raja Surajmal ( राजा सूरजमल 1755−1763 )

भारत के इतिहास में सूरजमल को ‘जाटों का प्लेटो’ कहकर भी सम्बोधित किया गया है। राजा सूरजमल के दरबारी कवि ‘सूदन’ ने राजा की तारीफ में ‘सुजानचरित्र’ नामक ग्रंथ लिखा।

पानीपत की लड़ाई

सन 1761 में पानीपत का ऐतिहासिक युद्ध हुआ, जिसमें राजपूत−जाट−मराठा जैसे शक्तिशाली और वीर सैनिकों के होते हुए भी देश को हार का सामना करना पड़ा। मुख्य कारण हिन्दू शासकों का आपस में मेल न होना था। 

मृत्यु सं. 1820 (ता. 25 दिसंबर सन् 1763 रविवार) में हुई थी। उस समय उसकी आयु 55 वर्ष की थी।  सूरजमल ब्रजभाषा साहित्य का प्रेमी और कवियों का आश्रयदाता था। उसके दरबार में अनेक कवि थे, जिनमें सूदन कवि का नाम प्रसिद्ध था।

सूरजमल की कई रानियाँ थी; जिनमें किशोरी और हंसा प्रमुख थीं। उसके 5 पुत्र थे, जिनके नाम निन्नांकित हैं −

  • जवाहर सिंह
  • रतन सिंह
  • नवल सिंह
  • रणजीत सिंह
  • नाहर सिंह।

सूरजमल के बाद जवाहर सिंह जाटों का राजा हुआ। जाटों की आरंभिक राजधानी डीग थी किंतु सूरजमल ने भरतपुर के कच्चे क़िले को पक्का बनाकर वहाँ अपनी राजधानी बनाई थी।

टोंक का मुस्लिम राज्य ( Muslim state of Tonk )

 सातवीं शताब्दी में एक ब्राह्मण ने 12 गांव को मिलाकर टोंक की पृष्ठभूमि तैयार की टोंक राज्य का संस्थापक अमीर खां पिंडारी था 17 नवंबर 1817 को अमीर खां ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि की। जिसके तहत् उसे टोंक का नवाब की उपाधि(पहला नवाब) एवं राज्य देकर सम्मानित किया गया।

राजस्थान में अंग्रेजों द्वारा टोंक में एकमात्र मुस्लिम राज्य की स्थापना की गई आमिर खां के पश्चात वजीर खां नवाब बना, इसके समय में 1857 का विद्रोह हुआ, नवाब इब्राहिम अली खान एकमात्र नवाब था जो लार्ड लिटन के दरबार तथा लार्ड कर्जन के दिल्ली दरबार में सम्मिलित हुआ

इब्राहिम अली खां ने टोंक में सुनहरी कोठी का निर्माण कराया जो पिच्चकारी व मीनाकारी के लिए प्रसिद्ध है। टोंक के इस तीसरे नवाब को अंग्रेजों ने कैद करके बनारस में नजरबंद किया था

इसी नवाब के दौरान इराक ईरान मिश्र भारत के विभिन्न शहरों से अरबी एवं फारसी भाषा के विद्वानों को बुलाकर धार्मिक एवं ऐतिहासिक पुस्तकों का लेखन एवं अनुवाद करवाया। जिन्हें टोंक लाकर शाही महल में रखा।

राजस्थान सरकार ने 1978 में इस लाइब्रेरी को अरबी फारसी शोध संस्थान के रूप में स्थापित किया। जब 1947 में देश विभाजन हुआ तो यहां के नवाब मोहम्मद सहादत अली खान ने भारत संघ में मिलने का फैसला किया

भीनमाल के चावड़ा ( Bhenamal Chawada )

चावड़ा राजपूतों का सबसे प्राचीन राज्य भीनमाल था इसके अन्य दो राज्य काठियावाड़ तथा अन्हिलवाड़ा थे। यह अपने आपको भगवान शंकर की संतान मानते हैं। भीनमाल के चावड़ों ने गुर्जरों से राज्य छीना।

चीनी यात्री ह्वेनसांग 641 ईस्वी में भीनमाल आया। भीनमाल में रहने वाले कवि माघ ने अपने ग्रंथ शिशुपाल वध में यहां का शासक सुप्रभदेव को बताया। इस वंश के नाश होने का संकेत कलचुरी के दान पत्र में मिलता है।

भीनमाल पर अरब आक्रमण की भी जानकारी मिलती है। अरबों के द्वारा नष्ट किए गए चारों के बचे हुए राज्यों को प्रतिहारों अपने अधिकार में ले लिया।

नागौर वंश ( Nagaur Dynasty )

महाभारत में नागौर का अहिच्छत्र राज्य के रूप में उल्लेख मिलता है। अर्जुन ने जीतकर अपने गुरु द्रोणाचार्य को समर्पित किया। यह क्षेत्र छापर चूरु के नाम से जाना गया,जो प्राचीन काल में द्रोणपुर के नाम से जाना जाता था।

बिजोलिया अभिलेख 1170 ईस्वी में नागौर का उल्लेख किया गया है। प्राचीन समय में यह कस्बा नागपुर नाम से भी जाना गया। जो चौहानों द्वारा शासित था। नागौर की पहचान जाटों के रोम के रूप में की जाती हैं।

7वीं सदी के लगभग यहां नागवंशी जाटों ने शासन किया। चौहानों ने भी राज्य कायम किया। जो सपादलक्ष में सम्मिलित किया गया। नागौर मध्य एशिया के मुस्लिम आक्रमणकारियों का मुख्य केंद्र रहा।

नागौर मीरा और अबुल फजल का जन्म स्थल भी रहा। नागौर में पार्श्वनाथ,चारभुजा मंदिर तथा सूफी संत तारकिन दरगाह बड़े प्रसिद्ध स्थल है।

झुंझुनू वंश ( Jhunjhunu Dynasty )

झुंझुनू का नाम एक प्रसिद्ध जाट लड़ाका जुझार सिंह नेहरा के नाम पर पड़ा। चौहानों वंशो का शासन था सिद्धराज एक प्रसिद्ध शासक थे।1450 ईस्वी में मोहम्मद खान एवं उसके पुत्र समस खान ने चौहानों को पराजित कर झुंझुनू पर अधिकार कर लिया।

मोहम्मद खान झुंझुनू का पहला नवाब बना। 1459 ईस्वी में उसका पुत्र समस खान झुंझुनू का नवाब बना 280 वर्ष तक नवाबों ने शासन किया।रोहिल्ला खान झुंझुनू का अंतिम नवाब था



रणथम्भौर का चौहान वंश ( Ranthambore Chauhan Vansh )

  • संस्थापक- गोविंद राज चौहान (पृथ्वीराज का पुत्र)
  • स्थापना-लगभग 1192

रणथम्भौर राज्य आरंभ से ही दिल्ली सल्तनत का करदाता राज्य रहा है। गोविंदराज चौहान से लेकर जयसिंह तक लगभग सभी शासकों ने दिल्ली सल्तनत को कर दिया किंतु जय सिंह के पुत्र हम्मीर देव चौहान ने यह परंपरा समाप्त की। यही से संघर्ष आरंभ हुआ।

रणथंभौर के चौहानों का इतिहास वास्तविक रुप मे हम्मीर देव चौहान की गौरवमयी कीर्ति से सुशोभित हुआ। हम्मीर देव जयसिंम्हा चौहान का तीसरा पुत्र था। संभवतः सभी पुत्रों में योग्यतम होने के कारण जयसिम्हा ने उसका राज्यारोहण उत्सव 1282 ई.मे अपने जीवनकाल में ही सम्पन्न कर दिया था

हम्मीरदेव चौहान (1282-1301)

  • हमीर महाकाव्य- जयचंद सूरी
  • हमीररासो-जोधराज
  • हमीर हठ-चंद्रशेखर
  • हम्मीरायण- व्यास भडाऊ
  • खनाइन-उल-फुतुह-अमीर खुसरो

    केसरिया- युद्ध में जीत की संभावना समाप्त होने पर राजपूत योद्धा शत्रु के समक्ष आत्मसमर्पण न कर केसरिया वस्त्र धारण करते थे। तथा वीरगति को प्राप्त होते थे ।

    जौहर- उक्त परिस्थितियों में राजपूत महिलाएं अपने सम्मान की रक्षा हेतु अग्नि को समर्पित होती थी।

    साका- केसरिया + जौहर

    अर्ध साका – दोनों में से एक ही घटना होने पर अर्थ साका कहलाता था।

    हम्मीर की दिग्विजय नीति :-

    राणा हम्मीर देव चौहान ने दिग्विजय की नीति अपनाई और उसनें समस्त उतर -पशिचम के राजपूत शासकों को जीता।उसनें सर्वप्रथम भीमरस के शासक अर्जुन को परास्त कर धार के शासक भोज परमार को परास्त किया।

    तदन्तर वह उतर की ओर चितौड़, आबू वर्धनपुर,पुष्कर,चम्पा होता हुआ स्वदेश लौटा। इस अभियान मे त्रिभुवनगरी के शासक ने उसकी अधीनता स्वीकार की। इस विजय अभियान से लोटने के बाद हम्मीर ने’कोटीयजन'(अशवमेघ जैसाही) का आयोजन किया। जिसका राजपुरोहित ‘विशवरुप’ था।

    हम्मीर देव Vs जलालुद्दीन खिलजी

    दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने रणथंभौर क्षेत्र पर 2 बार आक्रमण किया

    • 1291- इसमें जलालुद्दीन का रणथंभौर के जाईन क्षेत्र पर अधिकार हुआ तथा इसमें अमीर का सेनापति गुरदास सैनी मारा गया।
    • 1292- इस बार जलाल न रणथंभौर पर आक्रमण किया किंतु असफल होकर उसका कथन था-“एक मुसलमान के बाल की कीमत ऐसे हजारों किलों से कहीं अधिक है।”

    हम्मीर Vs अलाउद्दीन खिलजी

    दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी का रणथंभौर आक्रमण के कारण

    • 1299 अलाउद्दीन के विद्रोही सेनापति महमाशाह को शरण देना।
    • दिल्ली सल्तनत को नियमित कर न देना।
    • रणथंभौर दुर्ग का सामरिक महत्व।
    • अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी नीति।

    अलाउद्दीन रणथंभौर क्षेत्र पर 2 बार आक्रमण किया।

    हिन्दुवाट घाटी का युद्ध ( 1299 ) – अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खाँ और उलुख खाँ ने भाग लिया। हम्मीर के सेनापति भीमसिंह और धर्मसिंह ने भाग लिया। इसमें अल्लाउद्दीन का सेनापति नुसरत खां मारा गया तथा उलूग खां जान बचाकर भागा। यह हम्मीर की अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध प्रथम व अंतिम विजय मानी जाती हैं।

    स्वयं अलाउद्दीन का रणम्भौर आक्रमण ( 1301 )- इस युद्ध का आंखों देखा विवरण अल्लाउद्दीन के दरबारी अमीर खुसरो ने खजाईन-उल-फुतुह में किया। इसमें हम्मीर के सेनापति रणमल व रत्तिपाल ने विश्वासघात किया।

    इसमें हम्मीर का केसरिया व उसकी रानी रंगदेवी का जौहर हुआ। कुछ इतिहासकार इसे जल जौहर भी कहते हैं। यह रणथम्भौर का प्रथम साका कहलाया। वही रणथंभौर की चौहान शाखा समाप्त हुई।

    जालौर के चौहान ( Jalore Chauhan )

    जालौर दिल्ली से गुजरात व मालवा जाने के मार्ग पर पड़ता था वहां 13 वी सदी मैं सोनगरा चौहानों का शासन था कीर्तिपाल ने 1182 ईस्वी में जालौर के चौहान वंश की स्थापना की, कीर्तिपाल 1182 में प्रतिहारों को हराकर लगभग पूरा जालौर पर अधिपत्य स्थापित किया।

    वंशावली

    • कीर्तिपाल चौहान – 1182 ई
    • समर सिंह – 1182 – 1205 ई
    • उदय सिंह – 1205 – 1257 ई
    • चाचिंग देव – 1257 – 1282 ई
    • सामंत सिंह- 1282 – 1305 ई
    • कान्हड देव- 1305 – 1311 ई

    जालौर के चौहानों को सोनगरा चौहान कहा जाता है। जालौर का प्राचीन नाम जाबालीपुर था तथा यहां के किले की सुवर्णगिरि / सोनगढ़ कहते हैं जालौर किला स्वर्णगिरि पहाडी पर है,  कीर्तिपाल के बाद समरसिंह , उसके बाद उदयसिंह रहा जिसके शासन कल में सीमाओ में विस्तार हुआ।

    उदय सिंह

    जालोर का शासक बना 1205-1257 ईस्वी तक शासन किया । उदय सिंह सबसे पराक्रमी शासक सिद्ध हुआ जिसने अपने पराक्रम के बल पर जवालीपुर ( वर्त्तमान जालोर) समेत नदुला (वर्त्तमान नाडोल), माण्डवपुर (वर्त्तमान मंडोर), वाग्भट मेरु (जुना मेरु), सुरचंदा, रामसैन्या , सृमाला (वर्त्तमान भीनमाल), सत्यपुर(सांचोर) तक विस्तार किया एवं तुर्क आक्रान्ता इल्तुतमिश का भी सफलता पूर्वक प्रतिरोध किया ।

    इल्तुतमिश ने दो-दो बार जालोर पर आक्रमण किया पहली बार उदयसिंह की रणनिति के कारण उसे पराजित होकर वापस लौट जाना पड़ा और दूसरी बार भी उदय सिंह द्वारा गुजरात के बाघेला शासक के साथ सयुक्त मोर्चा बना लेने के कारण इल्तुतमिश बिना यद्ध किये लौटना पड़ा था ।

    दिल्ली दरबार को उदयसिंह ने कर देने से इंकार कर दिया, जिसके कारण 1211-1216 ईस्वी चार साल युद्ध चला बिना समझौता किये चौहान राजा उदय सिंह ने दिल्ली सल्तनत के द्वारा मिल रही युद्धरूपी चुनौतियों का सामना किया ।

    कान्हड़देव चौहान

    कान्हड़दे (1305 – 1311), सामंत सिंह की मृत्यु के बाद जालौर का शासक बना जो कि जालौर के शासकों में सबसे अधिक प्रतापी शासक था।

    कान्हड़ देव के बारे में हमें जानकारी पदनाम द्वारा लिखित कान्हड़ दे प्रबंध में मिलती है, तथा फरिश्ता द्वारा लिखित तारीख ए फरिश्ता , और अमीर खुसरो द्वारा लिखित खुदाइन- उल- फुतुह ओर मुहणोत नेणसी द्वारा लिखित मुहणोत नैणसी विख्यात और मकराना के शिलालेख से प्राप्त होती हैं।

    अलाउद्दीन खिलजी की पुत्री फिरोजा जो कि विरमदेव  (कान्हड़देव का पुत्र) से प्रेम करती थी। (श्रुति)

    कान्हड़देव के सेनापति जेता देवड़ा ने गुजरात से लौटते हुए अलाउद्दीन खिलजी की सेना को लूटा था, कान्हड़देव ने सोमनाथ के मंदिर( गुजरात) की मूर्ति के पांच टुकड़ों को पांच मंदिरों में स्थापित करवाया था

    अलाउद्दीन खिलजी ने जालोर पर अपना अधिकार करने हेतु योजना बनाई जालौर के मार्ग में सिवाना का दुर्ग पड़ता है अलाउद्दीन खिलजी ने कमालुद्दीन गुर्गे के नेतृत्व में 1308 में सिवाना को जीतने के लिए वर्तमान बाड़मेर में सेना भेजी थी सिवाना में घेरे  के दौरान कमालुद्दीन का सहायक सेनापति नाहर  खां मारा गया था

    अलाउद्दीन खिलजी ने 1308 ईसवी में सिवाना दुर्ग पर आक्रमण कर उसे जीता और उसका नाम खैराबाद रख कमालुद्दीन गुर्ग को वहां का दुर्ग रक्षक नियुक्त कर दिया था वीर सातल और सोम वीरगति को प्राप्त हुए

    कमालुद्दीन गुर्गे ने सिवाना को जीतने के बाद जालौर दुर्ग को जीतने के लिए 7 दिन तक प्रयास किए किंतु असफल रहा  कान्हड़देव की सेना ओर अलाउद्दीन खिलजी की सेना के बीच मालकाना का युद्ध (मेड़ता) 1308 में हुआ जिसमें अलाउद्दीन की सेना पराजित हुई

    अलाउद्दीन खिलजी ने 1311 में जालौर को जीतने के लिए कमालुद्दीन गुर्गे के नेतृत्व में सेना भेजी थी बीका देहिया ने कान्हड़देव के साथ विश्वासघात किया था कई दिनों के घेरे के बाद अंतिम युद्ध में अलाउद्दीन की विजय हुई और सभी राजपूत शहीद हुए

    वीर कान्हड़देव सोनगरा और उसके पुत्र वीरमदेव युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए

    अलाउद्दीन ने इस जीत के बाद जालौर में एक मस्जिद का निर्माण करवाया इस युद्ध की जानकारी पद्मनाभ के ग्रंथ काहड़दे ए तथा विरमदेव सोनगरा की बात में मिलती है

    मुहणोत नैणसी के अनुसार – कीत्तू एक महान राजा था।

    सिरोही के चौहान ( Sirohi Chauhan )

    सिरोही के राजा देवड़ा भाखा के चौहान वंश के राजपूत थे। इनके आदि पुरुष लुम्बा ने 1311 ईस्वी के लगभग आबू और चंद्रावती को परमारों से छीन कर वहां अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।

    उसके उत्तराधिकारी तेजसिंह, कान्हड़देव, सामंत सिंह लक्खा तथा रायमल थे।  चंद्रावती पर लगातार मुस्लिम आक्रमण के कारण रायमल के पुत्र शिभान ने सरणवां पहाड़ों पर एक दुर्ग की स्थापना की। तथा 1405 ई. में शिवपुरी नगर बसाया।

    इसके पुत्र साहसमल ने शिवपुरी को स्वास्थ्य की दृष्टि से सही न समझ कर 1425 ई. में सिरोही नगर बसाया। तथा उसे अपनी राजधानी बनाया। इसी के काल में कुंभा ने सिरोही पर अधिकार कर लिया।

    1825 ई. में यहाँ के शासक शिवसिंह ने सिरोही की सुरक्षा का भार ईस्ट इंडिया कंपनी पर डाल दिया।

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